पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी: पृथ्वीराज चौहान की विजय, संयोगिता की कहानी, मोहम्मद गौरी के बीच संघर्ष, पराजय के कारण, मूल्यांकन, आदि की संपूर्ण जानकारी

मुहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमणों के समय दिल्ली व अजमेर पर पुथ्वीराज चौहान (तृतीय) का शासन था जो इतिहास में ‘रयपिथौरा' के नाम से प्रसिद्ध है । पुथ्वीराज का जन्म 1166 ई. में हुआ था । वह अपने पिता सोमेश्वर की मुत्यु के बाद मात्र 11 वर्ष की आयु में चौहान साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना।| पुथ्वीराज की माँ कर्पूरदेवी कुशल राजनीतिज्ञा थी । इस कारण उसने प्रधानमंत्री कदम्बवास और सेनापति भुवनमल्ल की सहायता से राज्य का शासन आसानी से संभाल लिया । एक वर्ष तक माता के संरक्षण में रहने के बाद 1178ई. में पृथ्वीराज ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली । शीष्र ही उसने उच्च पदों पर अपने विश्वसनीय अधिकारियों की नियुक्ति कर विजय नीति को क्रियान्वित करने का बीड़ा उठाया। इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा के अनुसार इेस विजय नीति के तीन पक्ष थे - स्वजनों के विरोध से मुक्ति पाना, पड़ोसी राज्यों का दमन तथा विदेशी शत्रुओं का मुकाबला। 


पृथ्वीराज चौहान की विजये- पुथ्वीराज को अल्पव्यस्क देख कर उसके चाचा अपरगांग्य ने शासक बनने के लिए विद्रोह कर दिया | पुथ्वीराज ने उसे परार्त कर उसकी हत्या कर डाली किन्तु विरोधी दल शांत नहीं हुआ । अपरगांग्य के छोटे भाई नागार्जुन ने विद्रोह का बिगुल बजाते हुए गुरुग्राम (गुड़गांव) पर अधिकार कर लिया। पुथ्वीराज द्वारा सेना भेजने पर नागार्जुन गुरूग्राम (गु़डगांव) छोडकरं भाग गया । उसके सेनापति देवभट ने कुछ समय तक गुरूग्राम (गुड़गांव) को बचाने का प्रयास अवश्य किया किन्तु पृथ्वीराज की सेना सफल रही । विद्रोहियों को मौत के घाट उतार दिया गया और उनके सिर नगर की प्राचीरों पर लटका दिये गये जिसे भविष्य में अन्य शत्र उनके विरोध का साहस न कर सकें। 1182 ई. में पुथ्वीराज ने गुड़गांव व हिसार के आसपास बसी हुई भण्डानक नामक उपद्रवी जाति को पराजित कर अपने राज्य की उत्तरी सीमा को सुरक्षित किया। समसामयिक लेखक जिनपति सूरि ने पृथ्वीराज द्वारा भण्डानकों के दमन का उल्लेख किया है। 


प्रारम्भिक सफलताओं के बाद पुथ्वीराज ने प्राचीन भारतीय शासकों के समान दिग्विजय नीति अपनाने का फैसला किया । भण्डानकों के दमन के बाद उसकी सीमाएँ चन्देलों के महोबा राज्य से मिलने लग गई थी । अपने कुछ सैनिकों की हत्या का बदला लेने के लिए पुथ्वीराज ने 1182 ई. में महोबा राज्य पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में चंदेल शासक परमर्दीदेव के दो सेनापति आल्हा व ऊदल लड़ते हुए मारे गए । विजयी पुथ्वीराजा पंजुनराय को महोबा का अधिकारी नियुक्त कर लौट आया।


पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज ने आबू की राजकुमारी इच्छिनी से विवाह कर गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय को अप्रसन्न कर दिया क्योंकि भीमदेव भी इच्छिनी के साथ विवाह का इच्छुक था। डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार दोनों शासकों के बीच संघर्ष का वास्तविक कारण उनके राज्यों की सीमाएँ मिलना और दोनों शासकों की महत्वकक्षाएं थी। दोनों शासकों के बीच छोटी-मोटी झड़पों के बाद जगदेव प्रतिहार की मध्यरस्थता से संधि हो गई किन्तु इस संधि से परम्परागत वैमनस्य समाप्त नहीं हुआ और चौहान-चालुक्य द्षेष भीतर ही भीतर सुलगता रहा । 

पृथ्वीराज के पूर्व में सिथत कन्नौज के गहड़वाल राज्य का शासक इस समय जयचन्द्र था । दिल्ली पर नियन्त्रण को लेकर चौहानों और गहड़वालों के बीच परम्परागत वैमनस्य चला आ रहा था | पथ्वीराज दिग्विजय योजना को पूर्णता प्रदान करने के लिए कन्नौज को अपने राज्य में मिलाना चाहता था, वहीं जयचन्द्र भी उसकी होड़ में विजय योजनाएँ बना रहा था । इस कारण दोनों के बीच संघर्ष होना अवश्यम्भावी था | पुथ्वीराज द्वारा जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का बलपूर्वक अपहरण कर विवाह किया जाना दोनों शासकों के बीच संघर्ष का चरमोत्कर्ष था। अपनी पुत्री के अपहरण से जयचन्द्र पुथ्वीराज का पक्का शत्रु बन गया और बदला लेने का अवसर ढूंढने लगा । एक प्रचलित मत के अनुसार उसने सहायता का आश्वासन देकर मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया । पुरातन प्रबन्ध संग्रह के अनुसार गौरी के हाथों पुथ्वीराज की पराजय की खबर सुनकर जयचन्द्र ने अपनी राजधानी में खुशियाँ मनाई थी। 


संयोगिता की कहानी- चन्दरबरदाई की रचना 'पुथ्वीराज रासो के अनुसार जयचन्द्र और पृथ्वीराज चौहान के बीच संघर्ष का कारण पृध्वीराज चौहान द्वारा जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर उसके साथ विवाह करना था। कथानक के अनुसार पुथ्वीराज चौहान और जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता के बीच प्रेम था किन्तु जयचन्द्र पृथ्वीराज के साथ शत्रुताप्ण सम्बन्धों के चलते अपनी पुत्री संयोगिता का विवाह किसी अन्य राजा के साथ करना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने राजसूय यज़् के साथ संयोगिता के स्वयंवर का आयोजन किया। इस आयोजन में उसने पृथ्वीराज को छोडकर सभी प्रमुख राजा-महाराजाओं को आमन्त्रित किया। इतना ही नहीं जयचन्द्र ने पुथ्वीराज को अपमानित करने के लिए उसकी मूर्ति बनवाकर द्वारपाल के स्थान पर लगवा दी। स्वयवर के समय जब सभी राजा-महाराजा संयोगिता की वरमाला का इन्तजार कर रहे थे उस समय संयोगिता ने पुथ्वीराज की मूर्ति के। गले में वरमाला डाल दी। इसी वक्त पुथ्वीराज अपनी सेना सहित घटनास्थल पर पहुँच गया और संयोगिता को उठाकर ले गया। जयचन्द्र के सैनिकों से पुथ्वीराज को रोकने का प्रयास किया किन्तु वे असफल रहे। डॉ. आर. एस. त्रिपाठी, गौरीशंकर हीराचन्द और विश्वेश्वरनाथ रेक जैसे इतिहासकारों ने इसकी ऐतिहासिकता को मात्र प्रेमाख्यान कहकर अस्वीकार कर दिया है जबकि डॉ. दशरथ शर्मा ने ‘दि अर्ली चौहान डाइनेस्टीज' में संयोगिता की घटना को ऐतिहासिक तथ्य स्वीकार किया है। 


पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच संघर्ष - गजनी का गवर्नर नियुक्त होने के बाद मुहम्मद गौरी ने 1175 ईं. में मुल्तान पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने गुजरात, सियालकोट और लाहौर के युद्धों में विजय हासिल कर अपनी शक्ति का परिचय दिया। राजस्थानी स्रोतों के अनुसार इस दौरान उसकी पुथ्वीराज चौहान के साथ अनेक बार लड़ाइयाँ हुई और हर बार उसे पराजय का सामना ही करना पड़ा। पथ्वीराज रासो में 21 तथा हम्मीर महाकाव्य में सात बार गौरी पर पुथ्वीराज की विजयों का दावा किया गया है| दोनों के बीच दो निर्णायक युद्ध हुए। 1191ई. में लाहौर से रवाना होकर मुहम्मद गौरी तबरहिन्द नामक स्थान पर अधिकार करते हुए तराइन तक पहुँच गया। यहाँ दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें पुथ्वीराज चौहान के दिल्ली सार्मंत गोविन्दराज ने अपनी तलवार के वार से मुहम्मद गौरी को घायल कर दिया। घायल गौरी अपनी सेना सहित गजनी भाग गया । पुथ्वीराज ने तबरहिन्द पर अधिकार कर काजी जियाउद्दीन को बंदी बना लिया जिसे बाद में एक बड़ी धनराशि के बदले रिहा कर दिया गया। 

एक वर्ष बाद मुहम्मद गौरी अपनी सेना के साथ तराइन के मैदान में पुन: आ धमका। पृथ्वीराज उसका मुकाबला करने पहुँच गया किन्तू गौरी ने इस बार अपने शत्र को संधि वार्त के। झाँसे में फंसा लिया । कई दिन तक संधि वार्ता चलने के कारण चौहान सेना निशिचंत होकर आमोद-प्रमोद में जब गई । इसका फायदा उठाकर गौरी ने एक रात्रि अचानक आक्रमण कर दिया। राजपूत सेना इस अप्रत्याशित आक्रमण को झेल नहीं पाई और पराजित हुई। पराजित पुथ्वीराज चौहान को सिरसा के पास सरस्वती नामक स्थान पर बंदी बना लिया गया। पुथ्वीराज रासो के अनुसार बंदी पुथ्वीराज को गौरी अपने साथ गजनी ले गया जहाँ शब्द भेदी बाण के प्रदर्शन के समय पुथ्वीराज ने गौरी को मार डाला। जबकि समकालीन इतिहासकार हसन निजामी के अनुसार तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद पुथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी के अधीनस्थ शासक के रूप में अजमेर पर शासन किया था। इसामी के कथन के पक्ष में एक सिक्के का भी संदर्भ दिया जाता है जिसके एक तरफ मुहम्मद बिन साम और दूसरी तरफ पुथ्वीराज नाम अंकित है।


 पुथ्वीराज चौहान की पराजय के कारण- विजेता होने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान में दूरदर्शिता व कूटनीति का अभाव था। उसने अपने पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्व सम्बन्ध सथापित नहीं किये अपितु उनके साथ युद्ध करके शत्रुता मोल ले ली । इसी कारण मुहम्मद गौरी के विरद्ध संघर्ष में उसे उननका कोई सहयोग नहीं मिला। 1178 ई. में जब मुहम्मद गौरी ने गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय पर आक्रमण किया था, उस समय पुथ्वीराज ने गुजरात की कोई सहायता न कर एक ‘भूल की । तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित होकर भागती तुर्क सेना पर आक्रमण न करना भी उसकी एक भयंकर भूल सिद्ध हुई । यदि उस समय शत्रू सेना पर प्रबल आक्रमण करता तो मुहम्मद गौरी भारत पर पुनः आक्रमण करने के बारे में कभी नहीं सोचता । संयोगिता के साथ विवाह करने के बाद उसने राजकारयों की उपेक्षा कर अपना जीवन विलासिता में व्यतीत करना प्रारम्भ कर दिया था।

 पू्वीराज चौहान का मूल्यांकन- पृथ्वीराज एक वीर और साहसी शासक था। अपने शासनकाल के प्रारम्भ से ही वह युद्ध करता रहा जो उसके अच्छे सैनिक और सेनाध्यक्ष होने को प्रमाणित करता है। अनेक यूद्दों में सफलता प्राप्त कर उसने ‘दलपंगुल' (विश्वविजेता) की उपाधि धारण की। तराइन के द्वितीय युद्ध में मुहम्मद गौरी द्वारा छल-कपट का सहारा लेने से पूर्व वह किसी भी लड़ाई में नहीं हारा था। एक विजेता के। साथ-साथ वह विद्यानुरागी था । उसके दरबार में अनेक विद्वान रहते थे जिनमें - विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन, जयानक, विश्वरूप, आशाधर आदि प्रमुख थे। चन्दरबरदाई उसका राजकवि था जिसका ग्रंथ 'प्वीराज रासो' हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य माना जाता है। 


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