राजस्थान के औद्योगिक विकास में आने वाली बाधाओं/समस्याओं का सा देते हए राज्य में औद्योगिक विकास की संभावनाओं का आंकलन


राजस्थान के औद्योगिक विकास में बाधाएँ। राजस्थान प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण है। यहाँ अनेक प्रकार के कृषिजन्य पदार्थ तथा खनिज पदार्थ पाए जाते हैं। पशुधन बड़ी संख्या में है,पर्याप्त जनसंख्या है, पूँजी भी पिछड़ेपन के निम्नलिखित कारण हैंलिपल मात्रा में है लेकिन फिर भी राजस्थान राज्य औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा है। इसके





मत्स्य जनपद




(1) स्थलाकृति - राजस्थान का दो-तिहाई भाग शुष्क व अर्द्धशुष्क है । इस भू-भाग में लगभग एक-तिहाई जनसंख्या निवास करती है। मध्य का विस्तृत क्षेत्र अरावली श्रेणियों से घिरा होने के कारण उद्योगों की स्थापना में बाधक है।





(2) जल का अभाव - औद्योगिक क्रियाओं के लिए स्वच्छ व पर्याप्त मात्रा में जल की आपूर्ति होना आवश्यक है। राजस्थान एक शुष्क प्रदेश है जहाँ वर्षा का औसत बहुत कम है। तथा नित्यवाही नदियों का अभाव है। अकालों का प्रकोप हमेशा बना रहता है। पश्चिमी राजस्थान में पानी की कमी के कारण उद्योगों की स्थापना व विकास में कठिनाई आती है। अनेक क्षेत्रों में पीने का पानी भी बहुत मुश्किल से उपलब्ध हो पाता है। अतः इन क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना व उनके विकास में कठिनाइयाँ आती हैं।





(3) शक्ति के साधनों का अभाव होना - उद्योगों के संचालन के लिए राजस्थान में शक्ति के साधनों का काफी अभाव है । शक्ति के साधनों में कोयला केवल पलाना क्षेत्र में ही मिल पाता है और वह भी निम्न किस्म का है। वर्तमान में भाखड़ा-नांगल,चम्बल,माही बजाज सागर परियोजनाओं से विद्युत शक्ति उपलब्ध होने के कारण कोटा, चित्तौड़गढ़, भरतपुर, अलवर,जयपुर आदि स्थानों पर उद्योग स्थापित किए जा सके हैं । राजस्थान के पश्चिमी जिलों में पैट्रोलियम की प्राप्ति के लिए निरन्तर खोज व अनुसंधान का कार्य जारी है । राणा प्रताप सागर बाँध के समीप रावतभाटा में अणु भट्टी से बिजली प्राप्त की जा रही है लेकिन फिर भी राज्य में ऊर्जा का काफी अभाव बना हुआ है जिसके कारण उद्योगों की स्थापना समुचित मात्रा में नहीं हो





(4) वन क्षेत्र का अपर्याप्त होना - राजस्थान का क्षेत्रफल भारत के कुल क्षेत्रफल का 10.4 प्रतिशत है जबकि यहाँ देश के कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.8 प्रतिशत भाग ही पाया जाता है। अतः वनों की कमी के कारण वन पदार्थों यथा-इमारती व औद्योगिक लकड़ी आदि का आयात करना पड़ता है जिससे लागत अधिक आती है।





(5) परिवहन व संचार साधनों का अभाव - राजस्थान में यातायात व संचार साधनों की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण उद्योगों की स्थापना आवश्यकता के अनुसार नहीं हो सकी है । सन् 1951 में राज्य में सड़कों की कुल लम्बाई केवल 17,339 कि.मी.थी। प्रति 100 कि.मी. में 8.5 कि.मी. कच्ची-पक्की सड़कें थीं जो कि 2007-08 में बढ़कर प्रति 100 वर्ग कि.मी. पर 52.85 कि.मी. हो गई। लेकिन यह भारत में औसत प्रति 100 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 102.92 किमी.की तुलना में काफी कम है । संचार व्यवस्था की दुर्दशा इस बात से स्पष्ट है कि 247 कि.मी. में एक डाकघर तथा 1902 कि.मी. में एक तार घेर था । इस प्रकार की स्थितियों में आद्योगिकरण होना असंभव था। वर्तमान में परिवहन व संचार साधनों की व्यवस्था में काफी वर्तमान में राज्य में 1,80,854 कि.मी.लम्बी सड़कें हैं फिर भी राज्य में जैसलमेर, बाड़मेर, डूंगरपुर, टोंक, झालावाड़ और जालौर में रेलमार्गा अभाव है। जोधपुर, बीकानेर व उदयपुर जिलों में रेलमार्ग बहत कम हैं। संचार साधनों की कमी औद्योगिकरण के विकास में बाधक है। 6) कच्चे माल की आपूर्ति का अभाव-राज्य में उद्योगों के लिए माल उत्तम किस्म का नहीं है तथा यह अपर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। राज्य के अधिकांश मरुस्थलीय होने व सिंचाई के साधनों की कमी आदि के कारण व्यावसायिक फसलों उत्पादन कम होता है। कपास व गन्ने की किस्म अच्छी नहीं है। कोयला घटिया किस्म तथा लोहा अपर्याप्त मात्रा में पाया जाता है । अतः कृषि व खनिज आधारित उद्योगों को वांकित संख्या में स्थापित नहीं किया जा सका है।





(7) प्रशिक्षित व तकनीकी श्रमिकों का अभाव - राज्य में उद्योगों के लिए प्रशिक्षित श्रमिक तथा तकनीकी कर्मचारियों की कमी भी औद्योगीकरणं की प्रमुख बाधा रही है। राज्य में किसी उद्योग की स्थापना के लिए तकनीकी व्यक्तियों को बाहर से बुलाना पड़ता है। तकनीकी ज्ञान के अभाव के फलस्वरूप राज्य से अभ्रक, जिप्सम, मैंगनीज आदि सभी खनिजों को बाहर भेज दिया जाता है। इसी प्रकार अधिकांश ऊन तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण बाहर भेज दी जाती है। उक्त बाधाओं के कारण राज्य में औद्योगिक विकास संभव नहीं हो पाया है।





(8) पूँजी - उद्योगपतियों ने अपने राज्य में पूँजी का निवेश न करके, अन्य राज्यों में उद्योगों की स्थापना की है। बैंकों व वित्त निगम आदि से आसानी से ऋण उपलब्ध नहीं हो पाता है। राज्य में पूंजी का निर्माण देश की अपेक्षा धीमी गति से हो रहा है। डॉ. कोलीन क्लार्क के अनुसार किसी देश की जनसंख्या में एक प्रतिशत वृद्धि के जीवन स्तर को बनाये रखने के लिए चार प्रतिशत वार्षिक विनियोग आवश्यक है। सन् 1991-2000 के दशक में राज्य में जनसंख्या वृद्धि 2.83 प्रतिशत हुई । बढ़ी हुई जनसंख्या के प्रभाव को प्रभावहीन करने के लिए 11.2 प्रतिशत विनियोग की आवश्यकता थी। वर्तमान परिस्थितियों में यह कठिन प्रतीत होता है।





(9) केन्द्र सरकार की उदासीनता - केन्द्र सरकार ने गत शताब्दी तक राज्य में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की स्थापना अधिक संख्या में नहीं की है। परिणामस्वरूप राज्यम औद्योगीकरण धीमी गति से हुआ है लेकिन वर्तमान समय में राज्य सरकार के आग्रह पर केन्द्र सरकार की ओर से भविष्य में सहयोग मिलने की सम्भावना है.लेकिन फिर भी राजस्थान अन्य राज्यों की अपेक्षा औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है।





(10) बिगड़ते औद्योगिक संबंध - देश में मँहगाई में बढोत्तरी तथा श्रमिको का हठधर्मिता के साथ उद्योगपतियों में शोषण की प्रवृत्ति से आपसी औद्योगिक संबंधों में का पैदा हो गयी है। अत: देश के अन्य प्रान्तों की भांति राज्य भी तालाबंदी,श्रमिकों के हडतालों आदि से ग्रस्त है जिससे औद्योगिक विकास का रुकना अपरिहार्य हो जाता है ।





(11) सीमित बाजार - राज्य की अधिकांश जनसंख्या गरीब है तथा उसका जाप का जीवन स्तर निम्न है । परिणामस्वरूप औद्योगिक उत्पादों की माँग कम है जिसके कारण उद्योगमा की स्थापना करने से हिचकिचाते हैं। परिवहन साधनों के विकास के कारण बाहर भेजने व मंगवाने की सुविधा बढ़ी है जिससे बाजार के क्षेत्र में भी बढ़ोत्तरा दिखलाई देने लगी है। लेकिन अभी भी माँग में आशा के अनुकूल वृद्धि दारस के कारण माल को म भी बढ़ोत्तरी की संभावना कूल वृद्धि दृष्टिगोचर नहीं.





उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राजस्थान में औद्योगिक विकास की विपुल संभावनाएँ हैं लेकिन उनका व्यवस्थित ढंग से विकास नहीं हो पाया है। राज्य में उद्योगों की स्थापना प्रादेशिक योजना पर न होकर स्थान विशेष पर अथवा क्षेत्र विशेष में केन्द्रित होने की प्रवृत्ति दिखलाई देती है। कोटा में औद्योगिक विकास शक्ति के साधनों की उपलब्धता के कारण अधिक रहा है। इसी प्रकार अन्य क्षेत्रों में भी जहाँ शक्ति के साधनों की सुविधाएँ मिलेगी, औद्योगीकरण की गति में वृद्धि होगी। अतः राज्य के जिन जिलों में प्राकृतिक तथा स्थलाकृति की बाधाएँ हैं उनमें औद्योगिक विकास धीमी गति से होगा।





राजस्थान में औद्योगिक विकास की संभावनाएँ औद्योगिक संभावनाओं के आधार पर सम्पूर्ण राज्य को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है





(i) विशिष्ट श्रेणी - इसमें केवल जयपुर जिला आता है।





(ii) 'ए' श्रेणी - इसमें अलवर, दौसा, जोधपुर, भीलवाड़ा, राजसमंद, उदयपुर, बारां, कोटा, अजमेर व पाली जिले आते हैं।





(iii) 'बी' श्रेणी - इसमें बांसवाड़ा, नागौर, टोंक, सीकर, झुंझुनूं, भरतपुर, बीकानेर, चित्तौड़गढ़,गंगानगर,हनुमानगढ़,चूरू,सवाई माधोपुर तथा करौली जिले आते हैं।





(iv) 'सी' श्रेणी - इसमें चूरू, झालावाड़, दी, सिरोही, डूंगरपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर तथा धौलपुर जिले आते हैं। __ राजस्थान में औद्योगिक संभाव्यताओं की जानकारी प्राप्त करने के लिए वर्ष 1972 में सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं द्वारा एक सर्वेक्षण करवाया गया जिससे स्पष्ट हुआ कि राज्य में कृषि, वनस्पति तथा खनिज सम्पदा पर आधारित उद्योगों के लिए काफी संभावनाएँ विद्यमान हैं। इनका उपयोग राज्य के औद्योगिक विकास के लिए किया जा सकता है। राजस्थान में औद्योगिक विकास की दृष्टि से निम्नलिखित तथ्य महत्त्वपूर्ण हैं





(1) कृषि पर आधारित उद्योग - राजस्थान की लगभग 70% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। गेहूँ, तिलहन,गन्ना,कपास,दालें,चना,मूंगफली आदि अनेक इस प्रकार की फसलें हैं जिनसे संबंधित अनेक उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं। राज्य में सूती वस्त्र के कारखाने जयपुर, अलवर, धौलपुर,चित्तौड़गढ़,जोधपुर,डूंगरपुर,झुंझुनूं, हनुमानगढ़ व नोहर आदि स्थानों पर स्थापित किए जा सकते हैं। चीनी के कारखाने कोटा, भरतपुर, उदयपुर में, वनस्पति घी का कारखाना कोटा में तेल मिलें भरतपर, अलवर, गंगानगर व सवाई माधोपुर आदि केन्द्रों पर स्थापत किए जाने की संभावनाएँ हैं। राजस्थान जो कि बाजरा और मक्का का घर है, पर आधारित फूड प्रोसेसिंग उद्योग खोले जा सकते हैं।





(2) वनों पर आधारित उद्योग राज्य के दक्षिणी - पूर्वी भागों तथा अरावली श्रेणी के "लाला पर वन पाये जाते हैं। इन वनों से विभिन्न प्रकार की उपजें प्राप्त की जाती हैं लेकिन र छाटा उपजें ही मिलती हैं। इसलिए वनों पर आधारित वृहत उद्योगों के विकास का संभावना कम है लेकिन लघ एवं कटीर उद्योगों के विकास की पर्याप्त हयहाँ दियासलाई उद्योग और पैकिंग का कागज बनाने के कारखाने स्थापित संभावनाएं हैं।





उद्योग की भी विपुल डा बनाने व ऊनी होजरी के बीकानेर, अलवर, भरतपुर,राज्य में प्रतिवर्ष 5.8 का उपभोग होता। 102 उद्योग के विकास से दूध का पाउडर, मक्खन, पनीर, पशु आहार उद्योग राज्य के जोधपुर व बीकानेर क्षेत्रों में सूती कपड़ा बनाने वाली कारखाने स्थापित किए जा सकते हैं। हड्डी पीसने के कारखाने बीकानेर अब सवाई माधोपर आदि में स्थापित किए जाने की विपुल सम्भावनाएं हैं। राज्य में प हजार टन मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। जिनमें से राज्य में केवल 5 प्रतिशत का उपभोग अत: मछलियों को डिब्बों में बंद करने के कारखाने उदयपुर, अलवर तथा भरतपर कर स्थापित किए जा सकते हैं।





(4) खनिज पदार्थों पर आधारित उद्योग - खनिज उत्पादन में राजस्थान का टेसर महत्त्वपूर्ण स्थान है । इसके लिए निम्नलिखित परियोजनाएँ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं जिसे लिए सरकार प्रयासरत है





(i) हिन्दुस्तान जिंक लि. की मौलिक क्षमता 18,000 टन से बढ़ाकर 48,000 टन करना।





(ii) कोटा,बूंदी,सिरोही एवं चित्तौड़गढ़ आदि जिलों में चूने के पत्थरों के भण्डारों के प्रयोग के लिए सीमेण्ट के कारखाने लगाना।





(ii) नाथरा की पाल एवं चौD-मोरीजा के कच्चे लोहे के उपयोग हेतु उदयपुर में पिग आयरन संयंत्र लगाना।





(iv) सार्वजनिक क्षेत्र में तेल शोधक कारखाना सवाई माधोपुर में स्थापित किया जा सकता है।





(v) फेल्सपार, क्वार्ट्ज़ एवं चिकनी मिट्टी से चीनी के बर्तन बनाने के उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं।





(vi) सिलिका के उपयोग से काँच उद्योग स्थापित किया जा सकता है।





(vii) राज्य में सेलेनाइट खनिज भण्डारों के उपयोग से प्लास्टर ऑफ पेरिस, खिलौने बनाने के उद्योग तथा जिप्सम पर आधारित उद्योग की संभावनाएँ हैं।





(viii) भविष्य में मैथेनोल रसायन बनाने का 75 करोड़ की लागत का कारखाना कोटा में स्थापित किया जाएगा। इसके क्रियान्वयन के लिए रीको ने राष्ट्रीय कैमिकल्स एण्ड फर्टिलाइजर्स लि.का चयन किया है।





(ix) राष्ट्रीय थर्मल पावर निगम द्वारा अंता (कोटा) में गैस पर आधारित पावर प्रोजेक्ट की स्थापना की जाएगी।





(x) राज्य में रसायन पर आधारित उद्योगों में एल्यूमीनियम क्लोराइड परियोजनाएँ फास्फोरिक उर्वरक,सोडाऐश से संबंधित कारखाने स्थापित किए जा सकते हैं।





(5) राज्य में प्रस्तावित प्रमुख कारखाने-राजस्थान में निम्नलिखित बड़े उद्योगों की स्थापित किए जाने के प्रस्ताव विचाराधीन हैं





(i) चित्तौड़गढ़ जिले में पेट्रो रसायन का कारखाना।





(ii) सीकर में सलादीपुर में रॉक फॉस्फेट पर आधारित खाद का कारखाना।





(iii) सांभर के समीप नमक पर आधारित कॉस्टिक सोडा बनाने का कारखाना ।





(iv) बूंदी जिले में पाइराइट पर आधारित खाद का कारखाना ।





(v) भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स का ट्रांसफार्मर का कारखाना ।





(vi) प्रतिरक्षा उपकरण बनाने का कारखाना ।





उपर्यक्त संभावनाओं के अतिरिक्त राज्य में उद्योगों की संभावनाओं से संबंधित खित सुविधाएँ उपलब्ध हैं-(i) कुशल श्रमिक, (ii) अनकल औद्योगिक नीति, विस्तृत क्षेत्रफल, (iv) पर्याप्त मानव संसाधन, (v) विख्यात उद्यमी, (vi) पर्याप्त पूंजी, प्राकतिक गैस व तेल के वृहद् भण्डारों की संभावना





राजस्थान में तीव्र औद्योगिक विकास हेतु उपाय





सुझाव राजस्थान में औद्योगिकरण के विकास की गति को तीव्र बनाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं





(i) सरकार द्वारा निजी क्षेत्र को औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना के लिए प्रोत्साहित करना।





(ii) भूमि का औद्योगिक कार्यों के लिए रूपान्तरण करना। (iii) पावर सृजन में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाने का कार्यक्रम बनाना। (iv) शीघ्र स्वीकृतियाँ व प्रणाली का सरलीकरण करना।





(v) निर्यातोन्मुख इकाइयों को प्राथमिकता एवं निर्यात प्रोत्साहन औद्योगिक पार्क आदि की स्थापना करना





(vi) रुग्ण इकाइयों के पुनर्जीवन हेतु सुविधाएँ प्रदान करना। (vii) पूँजी विनियोग सब्सिडी, बिक्री कर प्रेरणा/आस्थगन की स्कीम बनाना ।





(viii) अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के उद्यमकर्ताओं को विशेष सहायता प्रदान करना।





(ix) महिला उद्यमकर्ताओं को प्रोत्साहन देना।





(x) राज्य के विशेष उद्योगों, जैसे चमड़ा आधारित उद्योग, चीनी मिट्टी, काँच, ऊन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, पर्यटन,खनिज आधारित उद्योगों के विकास के उपाय करना।





निष्कर्ष - उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राजस्थान प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से समद्ध होते हए भी कुछ बाधाओं के कारण औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े राज्यों की श्रेणी में है। सरकार की वर्तमान औद्योगिक एवं खनिज नीति राजस्थान के औद्योगिकरण के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती है।


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