कालीबंगा सभ्यताओं की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन, कालीबंगा सभ्यता के सांस्कृतिक महत्व


कालीबंगा सभ्यता कालीबंगा सभ्यता की जानकारी के लिए यहाँ कई सोपानों में खुदाई का काम पुरातत्व विभाग भारत सरकार द्वारा किया गया। घग्घर नदी (जिसका प्राचीन नाम सरस्वती था) के दो टीलों को चुना गया जो आस-पास की भूमि से लगभग 12 मीटर की ऊंचाई पर थे और जिनका क्षेत्रफल 12 किलोमीटर था। इनमें गहरी एवं चौड़ाई में खुदाई की गयी जिससे कई पक्षों पर अच्छा प्रकाश पड़ा। पुरातन सरल गया है, कई जगह खोज सर्वेक्षण से लगभग 100 छोले है। यह टीला, जिसमें पर्व मुख्य रूप से नगर योजना सरस्वती व दृपद्ती नदी के किनारे,जिनका उल्लेख ऋग्वेद में किया खदाई का कार्य 1960 के आसपास कराया गया। इस क्षेत्र के गा 100 छोटे-मोटे खण्ड व कालीबंगा स्थान का एक बड़ा टीला प्रकाश में आया जिसमें पर्व हड़प्पाकालीन बस्ती के भग्नावशेष थे,बड़े महत्व का है। इस टीले में सेनगर योजना के तीन खण्ड व कुछ उत्खनन से प्राप्त सामग्री मिली हुई है।





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कालीबंगा सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ





निर्माण - इन तीनों खण्डों की बस्ती घग्घर के तट पर स्थित कालीबंगा नाम से दिन तीनों खण्डों में एक किले का भाग है और दूसरे दो साधारण बस्ती के। तीनों से घिरे थे जो कच्ची ईंटों से बने थे। ये मिट्टी की कच्ची ईंटें 40/30 सेमी.लम्बी. विख्यात है। इन तीनों सेमी.चौड़ी व 10 सेमी ऊँची हैं। किले का भाग 240 मीटर उत्तर-दक्षिण और 120 मीटर पूर्व-पश्चिम में विस्तारित था। हाक ओर 5-6 चबूतरे थे जिन पर चढ़ने की सीढ़ियाँ थीं और वहाँ पहँचने के लिए ईंटों की वाला रास्ता था। सम्भवतः धार्मिक कृत्यों के लिए इसको उपयोग में लाया जाता होगा।





ऐसे ही कार्य के लिए वहाँ वेदियों का भी प्रावधान था। इसके एक अन्य भाग में समृद्ध दाय के मकान थे जो वैसी ही ईंटों के बने थे जिनसे दुर्ग की प्राचीरों का निर्माण कराया गया का मकान एक मंजिले होते थे जिनमें तीन-चार कमरे, आंगन तथा नालियाँ बनी हुई थीं। दर्गवाली बस्ती के दो प्रमुख द्वार थे।





दसरी बस्ती - इस नगर की दूसरी बस्ती नीचे की भूमि की ओर थी जिसकी लम्बाई 240-360 मीटर थी। यहाँ के मकान व प्राचीर उसी आकार-प्रकार की कच्ची ईंटों से बने थे जिस प्रकार दुर्ग की बस्ती के थे। मकान 5-7 मकानों के समूह में थे जिनको उत्तर-दक्षिण व पूर्व-पश्चिम जाने वाली सड़कों से जोड़ा गया था। इन सामूहिक मकानों में गलियों,पोल व संकरे रास्ते से होकर प्रत्येक कमरे या कमरों में जाया जाता था। दो-चार परिवारों के लिए भीतर कुएँ भी होते थे। कहीं-कहीं एक कमरा वेदी के लिए भी निर्धारित था। कई मकानों के बीच सहन भी होते थे तथा मकानों के बीच आंगन भी देखे गये हैं। इस बस्ती के भी दो प्रमुख द्वार थे। पानी के निकास के लिए लकड़ी व ईंटों की नालियाँ बनी हुई थीं जो सड़क में बने गड्ढों तक पानी पहुँचाती थी।





जुते हुए खेत - इस क्षेत्र की उत्खनन की सबसे अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि नगर की प्राचीर के बाहर जोती हुई कृषि भूमि है। घग्घर नदी के बाएँ किनारे पर स्थित खेत 3,000 वर्ष ई.पू.के पूर्वार्द्ध का है। उल्लेखनीय बात यह है कि संसार भर में उत्खनन से प्राप्त खेतों में यह पहला है। यहाँ खेत में दो तरह की फसलों को एक साथ उगाया जाता था, जैसे आज भी कालीबंगा के आस-पास के खेतों में होता है । खेत में ग्रिड पैटर्न की गर्तचारियों के निशान हैं और १दा तरह के निशान एक-दूसरे के समकोण पर बने हुए हैं।





दर का बस्ती खण्ड - इन दोनों बस्तियों से 80 मीटर आगे एक बस्ती खान जिसमें सदढ प्राचीर से बना एक कमरा मिला है जिसमें 4-5 अग्निकुण्ड थे। योजना की ये तीनों नगर खण्ड एक-दूसरे से विलग भी थे और सम्बद्ध भी। इनकी नगर योजना की नगर योजना के अनुरूप दिखाई देती है।





कला - प्रेम-कछ बर्तनों पर पेड़-पौधों व पक्षियों के चित्र मिले हैं। अंगार के नाम आभषणों के बनाने में यहाँ के निवासियों का कला-प्रेम व सांस्कृतिक रुचि का बोधना काँसे के दर्पण.हाथीदांत का कंघा.सोने व मूंगे तथा सीपों के आभूषण और ताँबे की पिने उन्नत सभ्यता के प्रतीक हैं । इस युग की विकसित सभ्यता कई एक मुहरों से, जिन पर पश और पुरुषों की आकृतियाँ बनी हैं या गाय के मुख वाले प्याले तथा तांबे का बैल आदि से सिद्ध है।





धार्मिक भावनाएं - कालीबंगा के निवासियों की मृतक के प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक भावनाओं को व्यक्त करने वाली यहाँ तीन प्रकार की समाधियाँ मिली हैं। वे अपने शवों को अण्डाकार खण्ड में सीधा उत्तर की ओर सर रख कर मृत्यु सम्बन्धी उपकरणों के साथ गाडते थे। दूसरी विधि में शव की टांगें समेट कर गाड़ा जाता था। तीसरी विधि में शव के साथ बर्तन और एक-एक सोने व मणि के दाने की माला से विभूषित कर गाड़ने की प्रथा थी। यहाँ के समाधि देवता सिन्धु सभ्यता के अनुरूप थे।





बर्तन - कालीबंगा के उत्खनन से मिट्टी के कई बर्तन और उनके अवशेष मिले हैं। यहाँ के बर्तनों की विशेषता में उनका पतला एवं हल्का होना पाया जाता है । उन्हें चाक में बनाया जाता था फिर भी उनको भौंडे ढंग से बनाया जाना स्पष्ट है। इनका रंग लाल है परन्तु ऊपर और मध्य भाग में काली एवं सफेद रंग की रेखाएँ दिखाई देती हैं। इन पर अलंकरण चौकोर, गोल, जालीदार, वृत्ताकार, घुमावदार, त्रिकोण एवं समानान्तर रेखाओं से किया जाता था। फूल, पत्ती, चौपड़,पक्षी,खजूर आदि का अलंकरण भी इन पर रहता था। बर्तनों में घड़े,प्याले,लोटे, हाँडियाँ, रकाबियाँ,सरावले,पैंदे वाले ढक्कन व लोटे भी होते थे। मछली,कछुए,बतख,हिरण आदि की आकृतियाँ भी इन पर बनाई जाती थीं।





अन्य वस्तुएँ - मकानों के अवशेषों व बर्तनों के अतिरिक्त यहाँ अन्य प्रकार की कई वस्तुएँ भी उपलब्ध हुई हैं, जिनमें खिलौने,पशुओं एवं पक्षियों के स्वरूप, मिट्टी की मुहरें,चूड़ियाँ, ताले. ताँबे की चूड़ियाँ,चाकू, ताँबे के औजार,काँच के मणिये आदि हैं। मिट्टी के भाण्डों पर एवं मुहरों पर अंकित लिपि सैन्धव लिपि के तुल्य है।





कालीबंगा के इस स्थान से ऐसे चिह्न मिले हैं जो किसी प्राचीन नगर से सम्बन्धित हैं। यह शहर चारों ओर मिट्टी की दीवार से घिरा था। मिट्टी की ईंटों से यहाँ के मकान बनाये गये थे। यहाँ के निवासी मिट्टी के सुन्दर बर्तन बनाते थे तथा उनका उपयोग करते थे। यह नगर, ये मकान,ये बर्तन कम से कम 4300 वर्ष पुराने हैं। इसके पश्चात् यहाँ सिन्धु सभ्यता के लोग आये और उन्होंने पुराने शहर के स्थान पर दूसरा शहर बसाया। इस शहर की चारदीवारी काफी बड़ी थी और शहर भी काफी सुन्दर था। चौड़ी और पक्की सड़कें थीं और कई छोटी-छोटी गलियाँ थीं। मोहनजोदड़ो व हडप्पा के विपरीत ये मकान मिट्टी के बनाये जाते थे किन्तु अन्य बातों में यहाँ की सभ्यता मोहनजोदड़ो से मिलती-जुलती है। जैसे-घरेलू उपयोग के बर्तन, औजार (पाषाण एवं धातु) आदि ।





सैन्धव लिपि - कालीबंगा उत्खनन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि इसने सन्धव लिपि की पहचान करने के प्रयास में एक ठोस दिशा निर्देश किया है। यहाँ से प्राप्त एक लिपि की ओवर लैपिंग (एक दूसरे पर आये अक्षर) ने यह सिद्ध कर शिव लिपि के मृद्पात्र पर लिपि की ओवर लै दिया है कि यह लिपि दाहिने से बायीं कालीबंगा की सभ्यता का लोप, नदियों का पानी सूखता गया और धीरे-धीरे वर्षा की कमी आती जंगल नष्ट हो गये और हरिया पीने के पानी की भी कमी होती, भागों में जाकर बस गये। की सभ्यता का लोप-डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने लिखा है कि ज्यों-ज्यों यहाँ की सखता गया और अन्य सहायक नदियों के बहाव के मार्ग दूसरी ओर मुड़ते गये वर्षा की कमी आती गयी,इस स्थान का कृषि कार्य नष्ट होता गया। सूखे के कारण गये और हरियाली भी चराई से कम होती गयी। मरुस्थल की बढ़ोतरी के कारण
भी कमी होती गयी।


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