मारवाड़ के राव मालदेव की उपलब्धियों और चरित्र का मूल्यांकन


राव मालदेव राव गाँगा का ज्येष्ठ पुत्र था। अपने पिता के समय में ही मालदेव ने अनेक सैनिक अभियानों में भाग लिया था और अपने युद्धकौशल का प्रदर्शन किया था। राव गाँगा की मृत्यु के बाद 5 जून, 1531 ई.को मालदेव मारवाड़ की गद्दी पर बैठा। डॉ. ओझा,डॉ. रघुवीर सिंह आदि के अनुसार मालदेव ने गाँगा को धक्का देकर गिरा दिया था जिससे राव गाँगा की मृत्यु हो गई।





marvad-maldev




राव मालदेव की विस्तारवादी नीति - राव मालदेव एक महत्त्वाकांक्षी और पराक्रमी शासक था। उसके पास एक शक्तिशाली सेना थी। उसने गद्दी पर बैठते ही विस्तारवादी नीति अपनाई क्योंकि गद्दी पर बैठने के समय उसके अधिकार में केवल जोधपुर व सोजत के ही परगने थे। उसने अनेक प्रदेशों को जीत कर अपने राज्य में सम्मिलित किया। उसने निम्नलिखित सैनिक अभियान किये





(1) भाद्राजूण पर अधिकार - 1539 ई. में मालदेव ने भाद्राजूण पर अधिकार कर लिया। भाद्राजूण का शासक वीरा युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया। इसके पश्चात् उसने रायपुर र आक्रमण किया। रायपुर का शासक भी मारा गया और रायपुर पर भी मालदेव का अधिकार हो गया।





(2) नागौर पर अधिकार - नागौर पर उस समय दौलत खाँ का अधिकार था। वह भी अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। अत: उसकी साम्राज्य विस्तार नीति की नीति पर अंकुश लगाने की दृष्टि से मालदेव ने नागौर पर आक्रमण किया और उस पर अधिकार कर लिया।





(3) मेड़ता पर अधिकार - मेड़ता का शासक वीरमदेव था। राव माँगा के समय में ही एक हाथी को लेकर वीरमदेव तथा मालदेव में वैमनस्य उत्पन्न हो गया था। वीरम ने अजमेर पर अधिकार करके मालदेव की क्रोधाग्नि को भड़का दिया था। अत: मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण किया और उस पर अपना आधिपत्य जमा लिया। वीरमदेव अजमेर की ओर भाग गया।





(4) अजमेर पर अधिकार - मालदेव वीरमदेव की शक्ति को नष्ट कर देने के लिए कटिबद्ध था। अतः 1538 ई. में उसने वीरमदेव को अजमेर से भी खदेड़ देने के लिए एक सेना भेजी। मालदेव की सेना ने वीरमदेव को अजमेर से भगा दिया और अजमेर पर अधिकार कर लिया । वीरमदेव इधर-उधर भटकने के बाद शेरशाह सूरी की शरण में चला गया।





(5) सिवाना पर अधिकार - सिवाना का शासक डूंगरसिंह था । नागौर के युद्ध के समय मालदेव ने डूंगरसिंह को अपनी सहायता के लिये बुलाया था परन्तु उसने मालदेव के अनुरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया। अतः 1538 ई. में मालदेव ने सिवाना को जीतने के लिए एक सेना भेजी परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। अतः मालदेव ने स्वयं एक सेना लेकर सिवाना के दुर्ग का घेरा डाल दिया । डूंगरसिंह खाद्य सामग्री के अभाव में दुर्ग छोड़ कर भाग निकला और सिवाना पर मालदेव का अधिकार हो गया।





(6) जालौर पर अधिकार - जालौर का शासक सिकन्दर खाँ था। यद्यपि मालदेव ने बिलोचियों के विरुद्ध सिकन्दर खाँ की सहायता की थी परन्तु उसने मालदेव की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा। इस पर मालदेव ने जालौर पर आक्रमण करने के लिये एक सेना भेज दी। 1540 ई.में मालदेव की सेना ने जालौर पर भी अधिकार कर लिया।





(7) जैसलमेर और मालदेव में वैमनस्य - 1536 ई. में मालदेव का विवाह जैसलमेर के शासक लूणकरण की पुत्री उमादे के साथ हुआ परन्तु मालदेव ने अपनी कामुकता से रानी उमादे को नाराज कर दिया। कहा जाता है कि विवाह की रात मालदेव ने अत्यधिक शराब पी और जब रानी उमादे की एक सुन्दर दासी भारमली रानी के आगमन की सूचना देने के लिये मालदेव के पास गई तो मालदेव भारमली पर आसक्त हो गया और उसके साथ सम्भोग करके अपनी कामपिपासा शान्त की। इस घटना से रानी उमादे रूठ गई और फिर मालदेव के पास कभी नहीं आई । मालदेव की मृत्यु के पश्चात् रानी उमादे भी उसके साथ सती हो गई।





(8) महाराणा उदयसिंह से वैमनस्य - प्रारम्भ में मालदेव और मेवाड़ के सम्बन्ध अच्छे थे परन्तु मालदेव ने अपनी अदूरदर्शिता से मेवाड़ को अपना शत्रु बना लिया। मेवाड़ के सामन्त झाला सज्जा का पुत्र जैतसिंह उदयपुर की जागीर को छोड़कर मालदेव के पास चला गया। मालदेव ने उसे खैखा की जागीर प्रदान कर दी। जैतसिंह ने अपनी पुत्री स्वरूपदेवी का विवाह मालदेव के साथ कर दिया। कुछ समय पश्चात् मालदेव ने स्वरूपदेवी की छोटी बहिन से भी विवाह करने का प्रस्ताव रखा परन्तु जैतसिंह ने उसे स्वीकार नहीं किया और अपनी पुत्री का विवाह महाराणा उदयसिंह से कर दिया। मालदेव ने इसे अपना अपमान समझा और इसका बदला लेने के लिये कुम्भलगढ़ पर आक्रमण कर दिया परन्तु उसे असफलता का मुँह देखना सका। इस घटना से मारवाड़ और मेवाड़ के बीच शत्रुता बढ़ गई।





(9) बीकानेर पर अधिकार - 1542 ई. में मालदेव ने बीकानेर पर अधिकार करने के लिये कँपा के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। बीकानेर के शासक जैतसिंह ने मालदेव की सेना का वीरतापूर्वक मुकाबला किया परन्तु उसे पराजय का सामना करना पड़ा और वह लड़ता हुआ युद्ध में मारा गया। शीघ्र ही मालदेव की सेना ने बीकानेर पर अधिकार कर लिया। मालदेव ने बीकानेर का शासन कँपा को सौंप दिया।





मालदेव का मूल्यांकन





(1) वीर योद्धा और महान् विजेता - मालदेव एक वीर योद्धा, कुशल सेनापति तथा महान् विजेता था। मारवाड़ की गद्दी पर बैठते समय उसके पास केवल जोधपुर और सोजत के प्रदेश ही थे, परन्तु उसने अपने साहस और पराक्रम के बल पर एक विशाल राज्य की स्थापना की जिसमें 48 परगने सम्मिलित थे। उसने भाद्राजूण, नागौर, अजमेर,मेड़ता,सिवाना,बीकानेर आदि पर विजय प्राप्त की और अपने युद्ध-कौशल का परिचय दिया।





(2) चतुर कूटनीतिज्ञ - मालदेव एक चतुर राजनीतिज्ञ भी था। उसमें अपने समय की राजनीतिक घटनाओं को समझने की पर्याप्त बुद्धि थी। जब हुमायूँ शेरशाह सूरी से कन्नौज की लड़ाई में निर्णायक रूप से पराजित हो गया तो उसने इस अवसर पर हुमायूँ को मारवाड़ आने का निमन्त्रण देकर अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया।





(3) निर्माणकर्ता - मालदेव एक महान् निर्माता था। उसने अनेक दुर्गों, जलाशयों आदि का निर्माण करवाया। उसने रियाँ,दुनाड़े,पीपाड़ आदि कस्बों के चारों ओर कोट बनवाकर उन्हें सुदृढ़ बनवाया। उसने सिवाणा,अजमेर,बीकानेर आदि के दुर्गों का जीर्णोद्धार करवाया।





(4) प्रशासक के रूप में - प्रशासन में उसने अपने पिता का ही अनुसरण किया। उसने समस्त सत्ता को अपने हाथों में ही केन्द्रित रखा और अपने आपको 'महाराजा', 'महाराजाधिराज व 'महाराय' की उपाधियों से अलंकृत किया। उसके प्रशस्ति-लेखों से यह भी ज्ञात होता है कि उसने 'राव' शब्द का प्रयोग किया है । बलबन की भाँति वह भी अपने दरबार का गौरव रखता था।





(5) साहित्य का संरक्षक - मालदेव विद्वानों एवं साहित्यकारों का संरक्षक था। उसके समय में डिंगल साहित्य की पर्याप्त उन्नति हुई। ईसरदान, आशानन्द आदि ने डिंगल भाषा में अपनी रचनाएँ लिखीं।


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